कृष्ण 'युक्त योगी' की पहचान बताते हैं। जो ज्ञान और अनुभव दोनों से तृप्त है — उसे और कुछ नहीं चाहिए। जो चट्टान की तरह अचल है — न हवा में उड़ता है, न झुकता है। जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया है — वह युक्त कहलाता है।
सबसे सुंदर बात यह है — जो मिट्टी, पत्थर और सोने को एक समान देखे। जिसके लिए फटे कपड़े और रेशमी वस्त्र बराबर हों। यह बाहरी समता नहीं — भीतरी समभाव है। जब मन में किसी चीज़ की लालसा न हो, तभी यह सम्भव है।