📿 श्लोक संग्रह

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा

गीता 6.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा
ज्ञान-विज्ञान से तृप्त आत्मा
कूटस्थः
अचल, स्थिर
विजितेन्द्रियः
इन्द्रियों को जीता हुआ
युक्तः इति उच्यते
युक्त — जुड़ा हुआ — कहलाता है
समलोष्टाश्मकाञ्चनः
मिट्टी-पत्थर-सोने में समान

कृष्ण 'युक्त योगी' की पहचान बताते हैं। जो ज्ञान और अनुभव दोनों से तृप्त है — उसे और कुछ नहीं चाहिए। जो चट्टान की तरह अचल है — न हवा में उड़ता है, न झुकता है। जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया है — वह युक्त कहलाता है।

सबसे सुंदर बात यह है — जो मिट्टी, पत्थर और सोने को एक समान देखे। जिसके लिए फटे कपड़े और रेशमी वस्त्र बराबर हों। यह बाहरी समता नहीं — भीतरी समभाव है। जब मन में किसी चीज़ की लालसा न हो, तभी यह सम्भव है।

यह श्लोक 'युक्त' की परिभाषा देता है — जो परमात्मा से जुड़ा हुआ है। गीता में 'युक्त' शब्द बार-बार आता है — यहाँ उसकी बाहरी और भीतरी पहचान दोनों बताई गई हैं।

ज्ञान अर्थात् शास्त्र का ज्ञान, विज्ञान अर्थात् अनुभव का ज्ञान — दोनों मिलकर तृप्ति देते हैं। केवल पढ़ा हुआ नहीं, जिया हुआ ज्ञान — यही पूर्णता है।

अध्याय 6 · 8 / 47
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