यहाँ से कृष्ण योगाभ्यास की व्यावहारिक विधि बताना शुरू करते हैं। वे कहते हैं — योगी को एकांत में रहना चाहिए, अकेले साधना करनी चाहिए। मन और शरीर दोनों को नियंत्रित रखना चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण — न कोई आशा हो, न कोई संग्रह।
आशा और परिग्रह — ये दो चीजें मन को सबसे अधिक भटकाती हैं। जब तक मन 'मुझे यह मिले' सोचता है या 'मेरे पास बहुत कुछ जमा हो' सोचता है — तब तक एकाग्रता नहीं आती। जैसे भरे हुए बर्तन में और पानी नहीं समाता।