📿 श्लोक संग्रह

योगी युञ्जीत सततम्

गीता 6.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥
योगी युञ्जीत
योगी जोड़ता रहे, अभ्यास करे
सततम्
सदा, निरंतर
आत्मानम्
अपने आप को
रहसि स्थितः
एकांत में रहते हुए
एकाकी
अकेले
यतचित्तात्मा
मन-शरीर को नियंत्रित करने वाला
निराशीः
आशा-रहित
अपरिग्रहः
संग्रह-रहित

यहाँ से कृष्ण योगाभ्यास की व्यावहारिक विधि बताना शुरू करते हैं। वे कहते हैं — योगी को एकांत में रहना चाहिए, अकेले साधना करनी चाहिए। मन और शरीर दोनों को नियंत्रित रखना चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण — न कोई आशा हो, न कोई संग्रह।

आशा और परिग्रह — ये दो चीजें मन को सबसे अधिक भटकाती हैं। जब तक मन 'मुझे यह मिले' सोचता है या 'मेरे पास बहुत कुछ जमा हो' सोचता है — तब तक एकाग्रता नहीं आती। जैसे भरे हुए बर्तन में और पानी नहीं समाता।

6.10 से 6.15 तक कृष्ण योगाभ्यास की विधि देते हैं — स्थान, आसन, मुद्रा, दृष्टि, श्वास और मन की स्थिति। यह गीता का सबसे व्यावहारिक खंड है।

पतञ्जलि के अष्टांग योग में भी 'अपरिग्रह' एक मुख्य यम है। गीता का यह श्लोक उसी परंपरा से जुड़ा है।

अध्याय 6 · 10 / 47
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