📿 श्लोक संग्रह

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य

गीता 6.11 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥
शुचौ देशे
स्वच्छ स्थान पर
प्रतिष्ठाप्य
स्थापित करके, बिछाकर
स्थिरम् आसनम्
स्थिर आसन
आत्मनः
अपना
नात्युच्छ्रितम्
बहुत ऊँचा नहीं
नातिनीचम्
बहुत नीचा नहीं
चैलाजिनकुशोत्तरम्
वस्त्र-मृगचर्म-कुशा से ऊपर से ढका

कृष्ण ध्यान के लिए आसन की विधि बताते हैं। पहले स्वच्छ जगह चुनो। फिर वहाँ कुशा घास बिछाओ, उसके ऊपर मृगचर्म, उसके ऊपर कपड़ा। आसन न बहुत ऊँचा हो, न बहुत नीचा।

यह व्यावहारिक निर्देश है। बहुत ऊँचे आसन पर बैठने से मन में अहंकार आता है, बहुत नीचे पर बैठने से एकाग्रता नहीं होती। सादगी से बनाया आसन मन को स्थिर रखने में सहायक होता है।

6.11 और 6.12 मिलकर आसन की पूरी विधि देते हैं। यह वैदिक काल से चली आ रही साधना-परंपरा का वर्णन है जो गीता में संक्षेप में आया है।

प्राचीन काल में कुशा-आसन और मृगचर्म दोनों पवित्र माने जाते थे। यह परंपरागत साधन थे जो ध्यान के समय उपयुक्त माने जाते थे।

अध्याय 6 · 11 / 47
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