📿 श्लोक संग्रह

एतन्मे संशयं कृष्ण

गीता 6.39 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥
एतत् मे संशयम्
यह मेरा संशय
कृष्ण
हे कृष्ण
छेत्तुम् अर्हसि अशेषतः
पूर्णतः काटने योग्य हैं आप
त्वदन्यः
आपके सिवा
संशयस्य अस्य छेत्ता
इस संशय का छेदक
न हि उपपद्यते
सम्भव नहीं, कोई नहीं है

अर्जुन बड़े विश्वास से कहता है — हे कृष्ण, इस संशय को पूरी तरह काट दो। पूरी तरह — 'अशेषतः' — कोई बाकी न बचे। और फिर वह कहता है — आपके सिवा इस संशय को काटने वाला कोई नहीं।

यह एक शिष्य की सुंदर भावना है — गुरु पर पूर्ण भरोसा। कृष्ण के पास ही उत्तर है — यह विश्वास है। और इसी विश्वास के बाद कृष्ण का उत्तर आता है जो बहुत आश्वासन देने वाला है।

6.37–39 तीन श्लोकों का प्रश्न-खंड है — पहले प्रश्न, फिर उपमा, फिर प्रार्थना। यह गीता की संवाद-शैली का सुंदर उदाहरण है। अर्जुन केवल जिज्ञासु नहीं — वह भक्त भी है।

'छेत्ता' — काटने वाला — यह शब्द ज्ञान की तलवार का प्रतीक है। कठोपनिषद् में भी 'तं दुरदर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितम्' — ज्ञान ही अंधकार काटता है।

अध्याय 6 · 39 / 47
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