📿 श्लोक संग्रह

पार्थ नैवेह नामुत्र

गीता 6.40 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥
पार्थ
हे पार्थ (अर्जुन)
न एव इह न अमुत्र
न इस लोक में न परलोक में
विनाशः तस्य विद्यते
उसका विनाश होता है
न हि कल्याणकृत्
निश्चय ही भला करने वाला
कश्चित् दुर्गतिम् गच्छति
कोई बुरी गति को नहीं जाता
तात
हे प्रिय, हे पुत्र (स्नेह से)

यह कृष्ण का सबसे आश्वस्त करने वाला वचन है। अर्जुन को तीन श्लोकों में डर था — अधूरा योगी नष्ट तो नहीं हो जाता? कृष्ण बड़े प्यार से कहते हैं — न इस लोक में उसका नाश है, न परलोक में। जो भला करने की नीयत रखता है — उसे कोई बुरी गति नहीं मिलती।

'तात' — यह शब्द देखो। कृष्ण अर्जुन को 'तात' — प्रिय पुत्र — कहते हैं। बड़े स्नेह और भरोसे से कह रहे हैं — घबराओ मत। अच्छी नीयत से किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।

यह श्लोक गीता का सबसे आश्वासनपूर्ण वचनों में से एक है। अधूरे प्रयास की चिंता हर साधक को होती है — कृष्ण उसे यहाँ दूर करते हैं। 'कल्याणकृत् न दुर्गतिं गच्छति' — यह गीता की करुणा है।

6.40 से 6.45 तक अधूरे योगी के जन्म-जन्मांतर के पुण्य मार्ग का वर्णन है — एक बार जो पुण्य-कर्म शुरू हो, वह चलता रहता है।

अध्याय 6 · 40 / 47
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