अर्जुन की चिंता और गहरी हो जाती है। वह उपमा देता है — कटा हुआ बादल। जब किसी बादल का बड़े बादल से टुकड़ा अलग हो जाता है — वह न नीचे जाता है, न ऊपर, न इधर, न उधर। बस हवा में तैरता है और धीरे-धीरे गायब हो जाता है।
अर्जुन का डर यह है — क्या अधूरा योगी ऐसा ही हो जाता है? न सांसारिक सफलता मिली, न योग की सिद्धि मिली। दोनों से चूक गए। यह बड़ी वास्तविक चिंता है जो हर साधक के मन में होती है।