📿 श्लोक संग्रह

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टः

गीता 6.38 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥
कच्चित् न
क्या नहीं
उभयविभ्रष्टः
दोनों से भटका हुआ
छिन्नाभ्रम् इव नश्यति
कटे बादल की तरह नष्ट होता है
अप्रतिष्ठः
बिना आधार का, निराधार
महाबाहो
हे महाबाहु (कृष्ण)
विमूढः ब्रह्मणः पथि
ब्रह्म के मार्ग में भटका हुआ

अर्जुन की चिंता और गहरी हो जाती है। वह उपमा देता है — कटा हुआ बादल। जब किसी बादल का बड़े बादल से टुकड़ा अलग हो जाता है — वह न नीचे जाता है, न ऊपर, न इधर, न उधर। बस हवा में तैरता है और धीरे-धीरे गायब हो जाता है।

अर्जुन का डर यह है — क्या अधूरा योगी ऐसा ही हो जाता है? न सांसारिक सफलता मिली, न योग की सिद्धि मिली। दोनों से चूक गए। यह बड़ी वास्तविक चिंता है जो हर साधक के मन में होती है।

यह 6.37 का विस्तार है। अर्जुन दो प्रश्न करता है — 6.37 में 'कहाँ जाता है' और 6.38 में 'क्या नष्ट हो जाता है'। 'छिन्नाभ्र' की उपमा — कटा बादल — अर्जुन की कल्पना-शक्ति का उत्तम उदाहरण है।

यह प्रश्न केवल अर्जुन का नहीं — यह उन सभी का प्रश्न है जो जीवन के बीच में किसी राह पर थे और वह पूरी न हुई। कृष्ण का उत्तर (6.40–45) इसीलिए बहुत महत्वपूर्ण है।

अध्याय 6 · 38 / 47
अध्याय 6 · 38 / 47 अगला →