यह श्लोक अर्जुन का है, कृष्ण का नहीं। कृष्ण ने ध्यान और मन के नियंत्रण की बात कही, तो अर्जुन बड़ी ईमानदारी से कहता है — हे कृष्ण, यह मन तो बड़ा चंचल है! यह इधर-उधर भागता रहता है, बड़ा बलवान है, और बड़ा हठी भी है।
अर्जुन कहता है कि मन को वश में करना उतना ही कठिन है जितना हवा को मुट्ठी में पकड़ना। हवा को कोई रोक सकता है क्या? वह चारों ओर चलती है, दिखती नहीं, और पकड़ में नहीं आती। मन भी ऐसा ही है — एक पल यहाँ है, दूसरे पल कहीं और।
यह श्लोक इसलिए विशेष है क्योंकि अर्जुन हर उस मनुष्य की बात कह रहा है जिसने कभी ध्यान लगाने की कोशिश की हो। बैठो ध्यान करने, और मन भाग जाए — यह अनुभव सबका है। कृष्ण अगले श्लोक में इसका उत्तर देते हैं — अभ्यास और वैराग्य से मन वश में होता है।