📿 श्लोक संग्रह

चञ्चलं हि मनः कृष्ण

गीता 6.34 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — ध्यानयोग
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥
चञ्चलम्
चंचल
हि
निश्चय ही
मनः
मन
कृष्ण
हे कृष्ण
प्रमाथि
मथने वाला, विक्षुब्ध करने वाला
बलवत्
बलवान
दृढम्
हठी, दृढ़
तस्य
उसका
अहम्
मैं
निग्रहम्
वश में करना
मन्ये
मानता हूँ
वायोः इव
वायु की तरह
सुदुष्करम्
अत्यंत कठिन

यह श्लोक अर्जुन का है, कृष्ण का नहीं। कृष्ण ने ध्यान और मन के नियंत्रण की बात कही, तो अर्जुन बड़ी ईमानदारी से कहता है — हे कृष्ण, यह मन तो बड़ा चंचल है! यह इधर-उधर भागता रहता है, बड़ा बलवान है, और बड़ा हठी भी है।

अर्जुन कहता है कि मन को वश में करना उतना ही कठिन है जितना हवा को मुट्ठी में पकड़ना। हवा को कोई रोक सकता है क्या? वह चारों ओर चलती है, दिखती नहीं, और पकड़ में नहीं आती। मन भी ऐसा ही है — एक पल यहाँ है, दूसरे पल कहीं और।

यह श्लोक इसलिए विशेष है क्योंकि अर्जुन हर उस मनुष्य की बात कह रहा है जिसने कभी ध्यान लगाने की कोशिश की हो। बैठो ध्यान करने, और मन भाग जाए — यह अनुभव सबका है। कृष्ण अगले श्लोक में इसका उत्तर देते हैं — अभ्यास और वैराग्य से मन वश में होता है।

यह श्लोक गीता के छठे अध्याय ध्यानयोग से है। कृष्ण ने ध्यान की विधि बताई, तो अर्जुन ने यह व्यावहारिक कठिनाई सामने रखी। कृष्ण ने अगले श्लोक (6.35) में उत्तर दिया — अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में किया जा सकता है।

परंपरा में इस श्लोक को मन की चंचलता का सबसे सटीक वर्णन माना जाता रहा है। योग-शास्त्रों में भी मन को वायु की उपमा दी गई है।

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