📿 श्लोक संग्रह

योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः

गीता 6.33 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम् ॥
यः अयम् योगः त्वया प्रोक्तः
यह योग जो आपने बताया
साम्येन
समत्व से, समभाव से
मधुसूदन
हे मधुसूदन (कृष्ण)
एतस्य अहम् न पश्यामि
इसकी मुझे नहीं दिखती
चञ्चलत्वात्
चंचलता के कारण
स्थितिम् स्थिराम्
दृढ़ स्थिति, पक्की नींव

यह अर्जुन का बड़ा ईमानदार प्रश्न है। कृष्ण ने समत्वयोग का सुंदर वर्णन किया — पर अर्जुन कहता है, हे मधुसूदन, मन की चंचलता के कारण मुझे इस योग की कोई पक्की नींव नहीं दिखती। यानी — यह सुनने में बहुत अच्छा लगता है, पर करना कैसे होगा?

यह प्रश्न हर साधक का है। ध्यान, समता, शांति — ये शब्द सुंदर हैं। पर जब बैठकर प्रयास करते हैं, मन भाग जाता है। अर्जुन वही बात कह रहा है जो हम सब अनुभव करते हैं।

6.33 और 6.34 मिलकर अर्जुन का प्रश्न बनाते हैं — 6.33 में योग की कठिनाई उठाई, 6.34 में मन की चंचलता का वर्णन किया। कृष्ण 6.35 में उत्तर देते हैं।

यह श्लोक गीता की संवाद-शैली का उत्तम उदाहरण है। अर्जुन केवल युद्ध के प्रश्न नहीं पूछता — वह आत्म-साधना की व्यावहारिक कठिनाइयाँ भी उठाता है।

अध्याय 6 · 33 / 47
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