📿 श्लोक संग्रह

आत्मौपम्येन सर्वत्र

गीता 6.32 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥
आत्मौपम्येन
स्वयं से उपमा देकर, अपने जैसा मानकर
सर्वत्र समम् पश्यति
सब जगह समान देखता है
यः अर्जुन
जो, हे अर्जुन
सुखम् वा यदि वा दुःखम्
चाहे सुख हो या दुख
स योगी परमः मतः
वह परम योगी माना जाता है

यह अध्याय के समदर्शन-खंड का अंतिम और सबसे सरल श्लोक है। जो दूसरों के सुख-दुख को अपने सुख-दुख जैसा मानकर देखे — यानी 'मुझे जितना दुख होता है, उसे भी उतना होता होगा' — इस भावना से जो जीए, वही परम योगी है।

यह बड़ी साधारण पर बड़ी गहरी बात है। करुणा का आधार यही 'आत्मौपम्य' है — स्वयं से तुलना। जब हम यह सोचें — 'जो मुझे होता, वह उसे भी होता है' — तब न भेद रहता है, न दूरी।

यह 6.29–32 खंड का समापन श्लोक है। 6.29 में सब में आत्मा देखने की बात थी — यहाँ 6.32 में उसका व्यावहारिक रूप आता है — दूसरों के सुख-दुख को अपना मानना।

करुणा और समता की यह भावना बौद्ध 'मैत्री-करुणा' परंपरा में भी है। भारत की आध्यात्मिक परंपराएँ इस बिंदु पर मिलती हैं — दूसरे को स्वयं जैसा जानना ही मुक्ति का मार्ग है।

अध्याय 6 · 32 / 47
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