यह अध्याय के समदर्शन-खंड का अंतिम और सबसे सरल श्लोक है। जो दूसरों के सुख-दुख को अपने सुख-दुख जैसा मानकर देखे — यानी 'मुझे जितना दुख होता है, उसे भी उतना होता होगा' — इस भावना से जो जीए, वही परम योगी है।
यह बड़ी साधारण पर बड़ी गहरी बात है। करुणा का आधार यही 'आत्मौपम्य' है — स्वयं से तुलना। जब हम यह सोचें — 'जो मुझे होता, वह उसे भी होता है' — तब न भेद रहता है, न दूरी।