📿 श्लोक संग्रह

असंशयं महाबाहो

गीता 6.35 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
असंशयम्
निःसंदेह, सच है यह
महाबाहो
हे महाबाहु (अर्जुन)
मनः दुर्निग्रहम् चलम्
मन को वश करना कठिन है, चंचल है
अभ्यासेन तु
पर अभ्यास से
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)
वैराग्येण च गृह्यते
और वैराग्य से पकड़ा जाता है

कृष्ण अर्जुन की बात से सहमत होते हैं — हाँ, मन सच में बहुत चंचल और वश में करना कठिन है। पर फिर वे उत्तर देते हैं — दो चीजों से यह वश में होता है — अभ्यास और वैराग्य। बस इन्हीं दो से।

अभ्यास यानी बार-बार करते रहना — गिरो, उठो, फिर करो। वैराग्य यानी विषयों में रुचि घटाते जाना — जो मन को खींचता है उसमें आसक्ति कम करते जाना। दोनों साथ काम करें तब मन धीरे-धीरे शांत होता है।

यह 6.34 के अर्जुन के प्रश्न का उत्तर है। पतञ्जलि के योगसूत्र 1.12 में भी यही कहा है — 'अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः' — अभ्यास और वैराग्य से मन का निरोध होता है। गीता और योगसूत्र यहाँ एक स्वर में बोलते हैं।

कृष्ण यहाँ अर्जुन को 'महाबाहो' और 'कौन्तेय' — दोनों नामों से पुकारते हैं। यह सम्मान का भाव है — मन की कठिनाई स्वीकार करना कमज़ोरी नहीं, ईमानदारी है।

अध्याय 6 · 35 / 47
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