📿 श्लोक संग्रह

यत्रोपरमते चित्तम्

गीता 6.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥
यत्र उपरमते चित्तम्
जहाँ मन विराम पाता है
निरुद्धम् योगसेवया
योगाभ्यास से नियंत्रित होकर
यत्र च एव
और जहाँ
आत्मना आत्मानम् पश्यन्
आत्मा द्वारा आत्मा को देखते हुए
आत्मनि तुष्यति
आत्मा में ही संतुष्ट होता है

यह श्लोक उस अवस्था का वर्णन करता है जहाँ मन योगाभ्यास से इतना नियंत्रित हो जाता है कि वह रुक जाता है — बाहर जाना बंद। और फिर एक अद्भुत बात होती है — आत्मा, आत्मा को ही देखती है। जब देखने वाला और दिखने वाला एक हो जाएँ — वहाँ परम संतोष है।

यह अवस्था सामान्य ध्यान से आगे की है। पहले मन रुकता है, फिर भीतर देखना शुरू होता है। जब भीतर की आत्मा दिखती है — तो बाहर की कोई भी चीज़ उतनी आनंददायक नहीं लगती।

6.20–23 एक इकाई हैं जिनमें योग की परम अवस्था का वर्णन है। यहाँ 'आत्मनात्मानं पश्यन्' — आत्म-दर्शन — का पहला उल्लेख है।

मांडूक्य उपनिषद् में 'तुरीयावस्था' और कठोपनिषद् में 'मनसैवेदमाप्तव्यम्' — इसी आत्म-दर्शन की परंपरा की ओर इशारा करते हैं।

अध्याय 6 · 20 / 47
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