यह श्लोक उस अवस्था का वर्णन करता है जहाँ मन योगाभ्यास से इतना नियंत्रित हो जाता है कि वह रुक जाता है — बाहर जाना बंद। और फिर एक अद्भुत बात होती है — आत्मा, आत्मा को ही देखती है। जब देखने वाला और दिखने वाला एक हो जाएँ — वहाँ परम संतोष है।
यह अवस्था सामान्य ध्यान से आगे की है। पहले मन रुकता है, फिर भीतर देखना शुरू होता है। जब भीतर की आत्मा दिखती है — तो बाहर की कोई भी चीज़ उतनी आनंददायक नहीं लगती।