कृष्ण उस सुख का वर्णन करते हैं जो योग की परम अवस्था में मिलता है। यह इन्द्रियों का सुख नहीं — मीठा खाना, सुंदर संगीत, शरीर का आराम — यह उससे कहीं ऊपर का है। यह बुद्धि से अनुभव होता है और इन्द्रियों की सीमा से परे है।
और इस सुख में जो स्थित हो जाता है, वह सत्य से नहीं हटता। जैसे एक गहरी नींद में सोया इंसान हल्की आवाज़ से नहीं जागता — उसी तरह इस सुख में स्थित योगी छोटी-बड़ी परिस्थितियों से नहीं डिगता।