📿 श्लोक संग्रह

यथा दीपो निवातस्थः

गीता 6.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥
यथा दीपः
जैसे दीपक
निवातस्थः
बिना हवा के स्थान पर रखा
न इङ्गते
नहीं काँपता, नहीं हिलता
सा उपमा स्मृता
वह उपमा कही गई है
योगिनः यतचित्तस्य
मन-नियंत्रित योगी की
युञ्जतः योगम् आत्मनः
आत्म-योग करते हुए

गीता की सबसे सुंदर उपमाओं में से एक है यह। कृष्ण कहते हैं — जिस जगह हवा न हो, वहाँ रखा दीपक बिल्कुल सीधा जलता है। उसकी लौ न इधर झुकती है, न उधर। बस एक शांत, सीधी रोशनी। ठीक वैसे ही वह योगी है जिसका मन नियंत्रित है।

हमारा मन उस दीपक की लौ जैसा है। जब विचारों की हवा आती है — वह काँपता है, भटकता है। जब हवाएँ रुक जाएँ — तब लौ स्थिर हो जाती है। ध्यान की साधना उसी निर्वात-स्थान को भीतर बनाने की कोशिश है।

यह उपमा 6.18 की परिभाषा को दृश्य रूप देती है। 'मन आत्मा में स्थिर हो जाए' — यह अमूर्त था। दीपक की उपमा उसे सबको समझ में आने वाला बनाती है।

परंपरा में इस उपमा को गीता की श्रेष्ठ उपमाओं में गिना जाता रहा है। दीपक की स्थिर लौ — यह भारतीय साहित्य में ध्यान-दशा का एक मान्य प्रतीक है।

अध्याय 6 · 19 / 47
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