📿 श्लोक संग्रह

यदा विनियतं चित्तम्

गीता 6.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥
यदा विनियतम् चित्तम्
जब पूर्णतः नियंत्रित चित्त
आत्मनि एव अवतिष्ठते
आत्मा में ही ठहर जाता है
निःस्पृहः
स्पृहा-रहित, कामना-रहित
सर्वकामेभ्यः
सभी कामनाओं से
युक्तः इति उच्यते तदा
तब युक्त कहलाता है

अब कृष्ण 'युक्त' की सबसे स्पष्ट परिभाषा देते हैं। जब मन पूरी तरह नियंत्रित होकर आत्मा में ही ठहर जाए — बाहर न जाए, किसी विषय की ओर न खिंचे — और जब सब कामनाओं से मुक्त हो जाए — तब उसे युक्त कहते हैं।

यह अवस्था कठिन है लेकिन असंभव नहीं। जैसे एक बच्चा जब कोई काम पूरे मन से करता है — तब उसे और कुछ याद ही नहीं रहता। उसी एकाग्रता का परिपक्व रूप ही 'युक्त' अवस्था है — जहाँ आत्मा ही एकमात्र अनुभव बन जाती है।

यह श्लोक गीता के छठे अध्याय की केंद्रीय परिभाषा है। 'युक्त' वह है जिसका मन आत्मा में स्थिर है और कामनाओं से मुक्त है। पाँचवें अध्याय से इस परिभाषा की तैयारी हो रही थी।

उपनिषद् में 'नेति नेति' की विधि से आत्मा को खोजा जाता है — सब हटाते जाओ। यहाँ गीता उसी का व्यावहारिक रूप बताती है — सब कामनाएँ हटा दो, आत्मा बच जाती है।

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