📿 श्लोक संग्रह

तत्रैकाग्रं मनः

गीता 6.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥
तत्र
वहाँ, उस आसन पर
एकाग्रम् मनः कृत्वा
मन को एकाग्र करके
यतचित्तेन्द्रियक्रियः
मन और इन्द्रियों को नियंत्रित करके
उपविश्य आसने
आसन पर बैठकर
युञ्ज्यात् योगम्
योग का अभ्यास करे
आत्मविशुद्धये
आत्मशुद्धि के लिए

6.11 में आसन तैयार किया। 6.12 में बैठकर क्या करना है — वह बताया। मन को एक जगह लाओ, इन्द्रियों की भागदौड़ रोको, और योग करो — लेकिन किसलिए? आत्मविशुद्धि के लिए — अपनी आत्मा को साफ करने के लिए।

यहाँ 'आत्मविशुद्धि' शब्द महत्वपूर्ण है। योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने के लिए नहीं — यह भीतर की सफाई के लिए है। जैसे हम रोज़ाना नहाकर बाहर साफ होते हैं, ध्यान से भीतर साफ होते हैं।

6.11–12 एक इकाई हैं — पहला आसन की तैयारी, दूसरा उस पर बैठकर की विधि। दोनों मिलकर 'ध्यानासन' की परंपरागत विधि बताते हैं।

परंपरा में 'आत्मविशुद्धि' को ध्यान का प्राथमिक उद्देश्य माना गया है। मन की शुद्धि से ही परमात्मा का दर्शन संभव है — यह उपनिषद् और गीता दोनों का मत है।

अध्याय 6 · 12 / 47
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