📿 श्लोक संग्रह

समं कायशिरोग्रीवम्

गीता 6.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥
समम् काय-शिर-ग्रीवम्
शरीर-सिर-गर्दन सीधे
धारयन्
धारण करते हुए, रखते हुए
अचलम् स्थिरः
अचल और स्थिर
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रम् स्वम्
अपनी नासिका के अग्र पर दृष्टि रखते हुए
दिशः च अनवलोकयन्
इधर-उधर न देखते हुए

कृष्ण शरीर की मुद्रा बताते हैं। शरीर, सिर और गर्दन — तीनों को सीधी एक रेखा में रखो। न आगे झुको, न पीछे। न हिलो। दृष्टि नाक के अगले हिस्से पर टिका दो — न आँखें बंद, न इधर-उधर।

यह शारीरिक स्थिरता का निर्देश क्यों है? क्योंकि जब शरीर स्थिर होता है, मन भी स्थिर होने लगता है। जैसे पानी तब शांत होता है जब उसका बर्तन न हिले। शरीर रूपी बर्तन स्थिर हो, तो मन रूपी पानी शांत होता है।

यह श्लोक गीता की ध्यान-विधि का तीसरा चरण है — पहले स्थान (6.11), फिर आसन (6.12), अब मुद्रा (6.13)। परंपरागत योग में 'काय-स्थैर्य' को ध्यान की पहली शर्त माना गया है।

नासिकाग्र-दृष्टि की परंपरा भारतीय ध्यान-शास्त्र में बहुत पुरानी है। यह मन को एक बिंदु पर केंद्रित करने की विधि है जो इधर-उधर भटकने से रोकती है।

अध्याय 6 · 13 / 47
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