📿 श्लोक संग्रह

प्रशान्तात्मा विगतभीः

गीता 6.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥
प्रशान्तात्मा
शांत मनवाला
विगतभीः
भय से मुक्त
ब्रह्मचारिव्रते स्थितः
ब्रह्मचर्यव्रत में स्थित
मनः संयम्य
मन को नियंत्रित करके
मच्चित्तः
मुझमें चित्त लगाए हुए
युक्तः आसीत
योगयुक्त होकर बैठे
मत्परः
मुझे ही परम मानते हुए

यहाँ कृष्ण ध्यान की आंतरिक अवस्था बताते हैं। बाहर शरीर स्थिर हो (6.13) — भीतर मन शांत हो, भय से मुक्त हो। ब्रह्मचर्यव्रत का पालन हो — अर्थात् इन्द्रियों का संयम। मन नियंत्रित करके कृष्ण पर ध्यान लगाओ।

अंत में कृष्ण कहते हैं — 'मत्परः' — मुझे ही परम जानते हुए बैठो। यह भक्तियोग का स्पर्श है। ध्यान की विधि चाहे जो हो, अंतिम लक्ष्य परमात्मा ही है।

6.13–14 मिलकर ध्यान की पूरी मुद्रा बताते हैं — बाहर से (6.13) और भीतर से (6.14)। ब्रह्मचर्य यहाँ केवल शारीरिक संयम नहीं — इन्द्रिय-संयम का व्यापक अर्थ है।

'मत्परः' शब्द यहाँ महत्वपूर्ण है। यह ज्ञानयोग और भक्तियोग का संगम-बिंदु है — ध्यान करो, पर लक्ष्य कृष्ण हों।

अध्याय 6 · 14 / 47
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