यह श्लोक 5.8 का विस्तार है। बोलना, छोड़ना, पकड़ना, आँखें खोलना-बंद करना — ये सब होता रहता है। और योगी यह जानता है — इंद्रियाँ अपने विषयों में लगी हैं, बस।
जैसे पंखा चलता है — उसके पंखे घूमते हैं, हवा आती है। लेकिन बिजली बस माध्यम है। ऐसे ही योगी की इंद्रियाँ चलती रहती हैं — पर वह स्वयं अलग है, साक्षी है।