📿 श्लोक संग्रह

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि

गीता 5.10 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
ब्रह्मणि
ब्रह्म में, परमात्मा को
आधाय
अर्पित करके
कर्माणि
कर्मों को
सङ्गम्
आसक्ति को
त्यक्त्वा
छोड़कर
करोति
करता है
यः
जो
लिप्यते
लिपटता है, प्रभावित होता है
नहीं
सः
वह
पापेन
पाप से
पद्मपत्रम्
कमल का पत्ता
इव
जैसे
अम्भसा
जल से

कृष्ण एक बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं। जो व्यक्ति अपने सारे कर्म परमात्मा को अर्पित करके, बिना आसक्ति के करता है — वह पाप से उसी तरह अछूता रहता है जैसे कमल का पत्ता पानी से।

बच्चे जानते हैं कि कमल कीचड़ में उगता है, पानी में रहता है — पर उस पर पानी की एक बूँद भी नहीं टिकती। बस यही योगी का स्वभाव है। वह दुनिया में रहता है, काम करता है — पर दुनिया उससे चिपकती नहीं।

यह श्लोक कर्मयोग का व्यावहारिक सार है। 'पद्मपत्रमिवाम्भसा' — यह उपमा गीता की सबसे प्रिय उपमाओं में से एक मानी जाती रही है।

परंपरा में यह माना गया है कि कर्मफल के प्रति निर्लिप्तता ही पाप से बचाती है, न कि कर्म का त्याग।

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