यह श्लोक योगी की पहचान बताता है। योग में स्थित, मन को जीता हुआ, इंद्रियों को वश में किए हुए — ऐसा व्यक्ति सब प्राणियों में अपनी आत्मा देखता है।
और सबसे बड़ी बात — ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी पाप या बंधन से नहीं लिपटता। जैसे कमल का फूल कीचड़ में रहकर भी कीचड़ से अछूता रहता है — वैसे ही योगी संसार में रहते हुए भी संसार के बंधन से मुक्त रहता है।