कृष्ण कहते हैं — तत्त्व को जानने वाला योगी यह मानता है कि 'मैं कुछ नहीं कर रहा।' देखना, सुनना, छूना, सूँघना, खाना, चलना, सोना, साँस लेना — ये सब होता रहता है, पर 'मैं' नहीं कर रहा।
यह बहुत गहरी बात है। जैसे नदी बहती है — पानी बह रहा है, पत्थर रास्ते में आते हैं, किनारे बदलते हैं। नदी कुछ 'करती' नहीं — बस प्रकृति के नियम से बहती है। योगी भी ऐसे ही जानता है कि उसके कर्म इंद्रियों और विषयों का खेल है, उसका 'मैं' उसमें नहीं है।