📿 श्लोक संग्रह

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्

गीता 5.9 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥
प्रलपन्
बोलते हुए
विसृजन्
छोड़ते हुए
गृह्णन्
ग्रहण करते हुए
उन्मिषन्
आँखें खोलते हुए
निमिषन्
आँखें बंद करते हुए
अपि
भी
इन्द्रियाणि
इंद्रियाँ
इन्द्रियार्थेषु
इंद्रिय-विषयों में
वर्तन्ते
बरत रही हैं
इति
ऐसा
धारयन्
जानते हुए, मानते हुए

यह श्लोक 5.8 का विस्तार है। बोलना, छोड़ना, पकड़ना, आँखें खोलना-बंद करना — ये सब होता रहता है। और योगी यह जानता है — इंद्रियाँ अपने विषयों में लगी हैं, बस।

जैसे पंखा चलता है — उसके पंखे घूमते हैं, हवा आती है। लेकिन बिजली बस माध्यम है। ऐसे ही योगी की इंद्रियाँ चलती रहती हैं — पर वह स्वयं अलग है, साक्षी है।

यह श्लोक 5.8 के साथ मिलकर 'अकर्तृत्व भाव' को पूरा करता है। योगी कर्ता नहीं है — यही भाव यहाँ स्थापित होता है।

परंपरा में 'इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते' पद को साक्षी-भाव की पहचान माना गया है।

अध्याय 5 · 9 / 29
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