📿 श्लोक संग्रह

संन्यासस्तु महाबाहो

गीता 5.6 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥
संन्यासः
संन्यास
तु
परंतु
महाबाहो
हे महाबाहु (अर्जुन)
दुःखम्
कठिन
आप्तुम्
पाना
अयोगतः
योग के बिना
योगयुक्तः
योग में स्थित
मुनिः
मनन करने वाला
ब्रह्म
ब्रह्म को
नचिरेण
शीघ्र ही
अधिगच्छति
प्राप्त कर लेता है

कृष्ण समझाते हैं — बिना कर्मयोग के सन्यास लेना बहुत मुश्किल है। मन अभी भी दुनिया में अटका रहता है, भले ही शरीर भगवा पहन ले।

लेकिन जो मनन करते हुए कर्मयोग में लगा रहता है — वह मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। जैसे धीमी आँच पर रखा दूध धीरे-धीरे गर्म होकर उबल जाता है — वैसे ही योगी का मन धीरे-धीरे परिपक्व होकर परमात्मा से मिल जाता है।

यह श्लोक कर्मयोग की व्यावहारिक श्रेष्ठता को स्थापित करता है। कृष्ण यहाँ संन्यास को अस्वीकार नहीं करते — बस यह कहते हैं कि उसे पाना कठिन है।

परंपरा में यह माना गया है कि योग की सहायता के बिना चित्त की शुद्धि नहीं होती, और चित्त की शुद्धि के बिना संन्यास केवल बाहरी आवरण रह जाता है।

अध्याय 5 · 6 / 29
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