कृष्ण समझाते हैं — बिना कर्मयोग के सन्यास लेना बहुत मुश्किल है। मन अभी भी दुनिया में अटका रहता है, भले ही शरीर भगवा पहन ले।
लेकिन जो मनन करते हुए कर्मयोग में लगा रहता है — वह मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। जैसे धीमी आँच पर रखा दूध धीरे-धीरे गर्म होकर उबल जाता है — वैसे ही योगी का मन धीरे-धीरे परिपक्व होकर परमात्मा से मिल जाता है।