कृष्ण अर्जुन को स्पष्ट उत्तर देते हैं — संन्यास और कर्मयोग, दोनों ही मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाते हैं। दोनों रास्ते एक ही मंज़िल तक पहुँचते हैं।
लेकिन फिर वे कहते हैं — इन दोनों में कर्मयोग अधिक श्रेष्ठ है। क्यों? क्योंकि कर्म छोड़ देना बहुत कठिन है। जैसे किसी बड़े पेड़ को जड़ से उखाड़ना कठिन होता है — वैसे ही मन से सारे कर्मों को छोड़ना आसान नहीं। कर्म करते हुए आसक्ति छोड़ना ज़्यादा व्यावहारिक है।