📿 श्लोक संग्रह

संन्यासः कर्मयोगश्च

गीता 5.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥
संन्यासः
संन्यास (कर्मत्याग)
कर्मयोगः
कर्मयोग
और
निःश्रेयसकरौ
मोक्ष देने वाले
उभौ
दोनों ही
तयोः
उन दोनों में
तु
परंतु
कर्मसंन्यासात्
कर्मसंन्यास की अपेक्षा
कर्मयोगः
कर्मयोग
विशिष्यते
श्रेष्ठ है

कृष्ण अर्जुन को स्पष्ट उत्तर देते हैं — संन्यास और कर्मयोग, दोनों ही मनुष्य को मोक्ष की ओर ले जाते हैं। दोनों रास्ते एक ही मंज़िल तक पहुँचते हैं।

लेकिन फिर वे कहते हैं — इन दोनों में कर्मयोग अधिक श्रेष्ठ है। क्यों? क्योंकि कर्म छोड़ देना बहुत कठिन है। जैसे किसी बड़े पेड़ को जड़ से उखाड़ना कठिन होता है — वैसे ही मन से सारे कर्मों को छोड़ना आसान नहीं। कर्म करते हुए आसक्ति छोड़ना ज़्यादा व्यावहारिक है।

यह श्लोक पाँचवें अध्याय में कृष्ण का पहला उत्तर है। वे अर्जुन की उलझन को दूर करते हुए कहते हैं कि दोनों मार्ग वैध हैं, पर कर्मयोग अधिक उपयुक्त है।

परंपरा में यह माना गया है कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए कर्मयोग सबसे सुलभ मार्ग है। पूर्ण संन्यास विरले लोग ही ग्रहण कर पाते हैं।

अध्याय 5 · 2 / 29
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