📿 श्लोक संग्रह

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी

गीता 5.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥
ज्ञेयः
जानना चाहिए
सः
वह
नित्यसंन्यासी
सदा का संन्यासी
यः
जो
न द्वेष्टि
द्वेष नहीं करता
न काङ्क्षति
कामना नहीं करता
निर्द्वन्द्वः
द्वंद्वों से रहित
हि
निश्चय ही
महाबाहो
हे महाबाहु (अर्जुन)
सुखम्
सरलता से
बन्धात्
बंधन से
प्रमुच्यते
मुक्त हो जाता है

कृष्ण कहते हैं — सच्चा संन्यासी वह है जो न किसी चीज़ से नफ़रत करता है, न किसी चीज़ की लालसा रखता है। वह कपड़े नहीं छोड़ता, घर नहीं छोड़ता — बस मन की दौड़ रोक लेता है।

जैसे एक बुज़ुर्ग दादी जिन्हें न किसी से जलन है, न किसी चीज़ की माँग — वे घर में रहते हुए भी बड़े हल्के मन की होती हैं। यही निर्द्वंद्वता है। ऐसे मनुष्य को बंधन सरलता से नहीं जकड़ पाते।

यह श्लोक कर्मसंन्यासयोग में संन्यास की असली परिभाषा देता है। कृष्ण यहाँ बाहरी संन्यास से अधिक आंतरिक संन्यास की बात करते हैं।

परंपरा में यह माना गया है कि द्वंद्वातीत अवस्था — सुख-दुख, हानि-लाभ से ऊपर उठना — ही मुक्ति का वास्तविक मार्ग है।

अध्याय 5 · 3 / 29
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