पाँचवें अध्याय का अंतिम श्लोक। कृष्ण कहते हैं — जो मुझे इस रूप में जानता है — यज्ञ और तप का भोक्ता, सब लोकों का महान ईश्वर, सब प्राणियों का मित्र — वह शांति पाता है।
तीन परिचय दिए कृष्ण ने अपने — यज्ञ-तप का ग्रहणकर्ता, सब लोकों का स्वामी, और सब प्राणियों का सुहृद। सबसे गहरी बात है 'सुहृद' — मित्र। जो ईश्वर को शत्रु, दंडक, या दूर की शक्ति नहीं, बल्कि अपना मित्र जानता है — वह शांत होता है।