📿 श्लोक संग्रह

भोक्तारं यज्ञतपसाम्

गीता 5.29 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥
भोक्तारम्
भोगने वाला, ग्रहण करने वाला
यज्ञतपसाम्
यज्ञ और तप का
सर्वलोकमहेश्वरम्
सब लोकों का महान ईश्वर
सुहृदम्
मित्र, हित चाहने वाला
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों का
ज्ञात्वा
जानकर
माम्
मुझे
शान्तिम्
शांति
ऋच्छति
प्राप्त करता है

पाँचवें अध्याय का अंतिम श्लोक। कृष्ण कहते हैं — जो मुझे इस रूप में जानता है — यज्ञ और तप का भोक्ता, सब लोकों का महान ईश्वर, सब प्राणियों का मित्र — वह शांति पाता है।

तीन परिचय दिए कृष्ण ने अपने — यज्ञ-तप का ग्रहणकर्ता, सब लोकों का स्वामी, और सब प्राणियों का सुहृद। सबसे गहरी बात है 'सुहृद' — मित्र। जो ईश्वर को शत्रु, दंडक, या दूर की शक्ति नहीं, बल्कि अपना मित्र जानता है — वह शांत होता है।

यह पाँचवें अध्याय का समापन श्लोक है। पूरा अध्याय कर्म-संन्यास-ज्ञान की एकता पर था — और यह श्लोक उसे ईश्वर-भाव में समेट देता है।

परंपरा में 'सुहृदं सर्वभूतानाम्' को गीता के सबसे मधुर पदों में माना गया है — परमात्मा केवल महान नहीं, वे हमारे सुहृद भी हैं।

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