📿 श्लोक संग्रह

यतेन्द्रियमनोबुद्धिः

गीता 5.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिः
जिसकी इंद्रियाँ, मन और बुद्धि वश में हैं
मुनिः
मुनि, मनन करने वाला
मोक्षपरायणः
मोक्ष को ही परम लक्ष्य मानने वाला
विगतेच्छा
इच्छा से रहित
भयक्रोधः
भय और क्रोध से रहित
यः
जो
सदा
सदा
मुक्तः
मुक्त
एव
ही
सः
वह है

यह श्लोक 5.27 का समापन करता है। जिस मुनि की इंद्रियाँ, मन और बुद्धि वश में हैं, जो मोक्ष को ही परम लक्ष्य मानता है, जिसके इच्छा-भय-क्रोध चले गए — वह सदा मुक्त ही है।

यहाँ 'सदा मुक्तः' — सदा मुक्त — बड़ा महत्वपूर्ण है। मुक्ति भविष्य की घटना नहीं है। जिसके ये तीन — इंद्रिय-मन-बुद्धि — वश में हैं, वह अभी, इसी क्षण, मुक्त है।

यह श्लोक 5.27-28 के जोड़े का दूसरा भाग है। 5.27 में विधि बताई — 5.28 में फल बताया।

परंपरा में 'सदा मुक्त एव सः' को जीवनमुक्ति का सबसे संक्षिप्त और स्पष्ट वर्णन माना गया है।

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