📿 श्लोक संग्रह

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्

गीता 5.27 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥
स्पर्शान्
बाहरी विषयों को
कृत्वा बहिः
बाहर कर
बाह्यान्
बाह्य
चक्षुः
दृष्टि
च एव
और भी
अन्तरे भ्रुवोः
भौंहों के बीच में
प्राणापानौ
प्राण और अपान को
समौ
सम, बराबर
कृत्वा
करके
नासाभ्यन्तर
नाक के भीतर
चारिणौ
चलने वाले

यह श्लोक और अगला (5.28) मिलकर ध्यान की विधि बताते हैं। बाहरी विषयों को बाहर छोड़ो, दृष्टि भौंहों के बीच टिकाओ, और नाक के भीतर चलने वाले प्राण-अपान को सम करो।

यह वही अभ्यास है जो ध्यान में सिखाया जाता है — मन को भीतर खींचो। बाहरी आवाज़ें, विचार — इन्हें बाहर छोड़ दो। साँस पर ध्यान लाओ। यह साधना का व्यावहारिक मार्ग है।

यह श्लोक 5.28 के साथ जोड़कर पढ़ा जाता है। दोनों मिलकर ध्यान-योग की संक्षिप्त विधि देते हैं।

परंपरा में इन दोनों श्लोकों को प्राणायाम और ध्यान का संक्षिप्त निर्देश माना गया है — विशेषतः योग-परंपरा में।

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