यह श्लोक और अगला (5.28) मिलकर ध्यान की विधि बताते हैं। बाहरी विषयों को बाहर छोड़ो, दृष्टि भौंहों के बीच टिकाओ, और नाक के भीतर चलने वाले प्राण-अपान को सम करो।
यह वही अभ्यास है जो ध्यान में सिखाया जाता है — मन को भीतर खींचो। बाहरी आवाज़ें, विचार — इन्हें बाहर छोड़ दो। साँस पर ध्यान लाओ। यह साधना का व्यावहारिक मार्ग है।