यह श्लोक 5.27 का समापन करता है। जिस मुनि की इंद्रियाँ, मन और बुद्धि वश में हैं, जो मोक्ष को ही परम लक्ष्य मानता है, जिसके इच्छा-भय-क्रोध चले गए — वह सदा मुक्त ही है।
यहाँ 'सदा मुक्तः' — सदा मुक्त — बड़ा महत्वपूर्ण है। मुक्ति भविष्य की घटना नहीं है। जिसके ये तीन — इंद्रिय-मन-बुद्धि — वश में हैं, वह अभी, इसी क्षण, मुक्त है।