📿 श्लोक संग्रह

न कर्तृत्वं न कर्माणि

गीता 5.14 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥
न कर्तृत्वम्
न कर्तापन को
न कर्माणि
न कर्मों को
लोकस्य
लोगों के लिए
सृजति
बनाता है
प्रभुः
परमात्मा, प्रभु
न कर्मफलसंयोगम्
न कर्म और फल का संयोग
स्वभावः
प्रकृति, स्वभाव
तु
परंतु
प्रवर्तते
प्रवृत्त होती है, काम करती है

कृष्ण एक गहरी बात कहते हैं — परमात्मा न लोगों के लिए कर्तापन बनाते हैं, न कर्म, न कर्म और फल का संयोग। यह सब प्रकृति अपने आप करती है।

जैसे सूर्य अपनी रोशनी से खेत को गर्माता है — पर वह यह नहीं करता कि किस खेत में क्या उगे। सूर्य बस चमकता है। प्रकृति बाकी काम करती है। ऐसे ही परमात्मा सबमें व्याप्त है — पर किसी के कर्म का कर्ता नहीं।

यह श्लोक परमात्मा की निर्लिप्तता को स्थापित करता है। ईश्वर पर कर्मफल का आरोप नहीं लगता — यह बोध यहाँ दिया जाता है।

परंपरा में इस श्लोक को ईश्वर के 'साक्षी' स्वभाव का संकेत माना गया है। वह सब देखता है, पर किसी के कर्म का लेखक नहीं।

अध्याय 5 · 14 / 29
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