📿 श्लोक संग्रह

सर्वकर्माणि मनसा

गीता 5.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥
सर्वकर्माणि
सभी कर्मों को
मनसा
मन से
संन्यस्य
त्यागकर
आस्ते
रहता है
सुखम्
सुखपूर्वक
वशी
मन को वश में करने वाला
नवद्वारे
नौ द्वारों वाले
पुरे
नगर में
देही
देहधारी जीव
न एव
नहीं ही
कुर्वन्
करते हुए
न कारयन्
न करवाते हुए

कृष्ण कहते हैं — मन को जीतने वाला देहधारी मन से सभी कर्मों को त्यागकर नौ द्वारों के इस नगर (शरीर) में सुखपूर्वक रहता है। वह न स्वयं कुछ करता है, न किसी से करवाता है।

शरीर के नौ द्वार हैं — दो आँखें, दो कान, दो नाक के छिद्र, एक मुख, और दो अन्य। यह नगर है हमारा शरीर। जो इस नगर का स्वामी बन जाए — जो मन से सब कर्म ईश्वर पर छोड़ दे — वह इसी शरीर में सुख से रहता है।

यह श्लोक शरीर को नौ-द्वार नगर की उपमा देता है — गीता की एक विशिष्ट और यादगार कल्पना। यहाँ 'मनसा संन्यास' की बात है — मन से त्याग, शरीर से नहीं।

परंपरा में इस श्लोक को देहात्मभाव से ऊपर उठने का संकेत माना गया है। देही (आत्मा) शरीर में रहता है पर शरीर नहीं है।

अध्याय 5 · 13 / 29
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