📿 श्लोक संग्रह

तस्मादज्ञानसम्भूतम्

गीता 4.42 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥
तस्मात्
इसलिए
अज्ञानसम्भूतम्
अज्ञान से उत्पन्न
हृत्स्थम्
हृदय में स्थित
ज्ञानासिना
ज्ञान रूपी तलवार से
आत्मनः
अपने
छित्त्वा
काटकर
एनम्
इस
संशयम्
संशय को
योगम्
योग को
आतिष्ठ
आश्रय लो, अपनाओ
उत्तिष्ठ
उठो
भारत
हे भारतवंशी (अर्जुन)

यह चौथे अध्याय का अंतिम श्लोक है। कृष्ण का यह आह्वान बहुत शक्तिशाली है। वे कहते हैं — इसलिए, अपने हृदय में अज्ञान से जन्मे इस संशय को ज्ञान की तलवार से काटो। योग में लगो। उठो, हे भारत! यह 'उठो' केवल अर्जुन के लिए नहीं — हर उस मनुष्य के लिए है जो भीतरी भ्रम में फँसा बैठा है।

पूरा अध्याय ज्ञान, यज्ञ, कर्म और संशय की बात करता है। और अंत में एक ही संदेश — संशय को काटो और उठ खड़े हो।

यह चौथे अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग का समापन श्लोक है। कृष्ण यहाँ सीधे अर्जुन को प्रेरित करते हैं।

पाँचवाँ अध्याय (कर्मसंन्यासयोग) इस प्रश्न से शुरू होगा कि संन्यास और कर्मयोग — दोनों में कौन श्रेष्ठ है।

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