📿 श्लोक संग्रह

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञात्

गीता 4.33 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥
श्रेयान्
श्रेष्ठ है
द्रव्यमयात्
द्रव्य (सामग्री) से किए गए
यज्ञात्
यज्ञ से
ज्ञानयज्ञः
ज्ञान-यज्ञ
परन्तप
हे परन्तप (अर्जुन)
सर्वम्
सब
कर्म
कर्म
अखिलम्
सम्पूर्ण
ज्ञाने
ज्ञान में
परिसमाप्यते
समाप्त हो जाता है, पूर्ण होता है

कृष्ण अब सबसे बड़ी बात कहते हैं — भौतिक सामग्री से किए गए यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ बड़ा है। और समस्त कर्म अंत में ज्ञान में ही समाप्त होते हैं। जैसे सभी नदियाँ अंत में समुद्र में मिलती हैं — वैसे सभी कर्म-मार्ग ज्ञान में मिल जाते हैं।

यह अध्याय का मुख्य विचार है। ज्ञान ही वह बिन्दु है जहाँ कर्म का अंत होता है — बन्धन नहीं, पूर्णता।

यह श्लोक इस पूरे अध्याय की धुरी है। ज्ञानकर्मसंन्यासयोग — इसी नाम का सार यहाँ एक वाक्य में है।

अगला श्लोक (4.34) बताता है कि यह ज्ञान कैसे प्राप्त करें — गुरु-शरण से।

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