📿 श्लोक संग्रह

तद्विद्धि प्रणिपातेन

गीता 4.34 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
तत्
उस ज्ञान को
विद्धि
जानो
प्रणिपातेन
साष्टांग प्रणाम से
परिप्रश्नेन
विनम्र प्रश्नों से
सेवया
सेवा से
उपदेक्ष्यन्ति
उपदेश देंगे
ते
तुम्हें
ज्ञानिनः
ज्ञानी जन
तत्त्वदर्शिनः
तत्त्व को देखने वाले

यह श्लोक गुरु-शिष्य परम्परा का सार है। कृष्ण कहते हैं — उस ज्ञान को प्रणाम से, जिज्ञासु प्रश्नों से और निष्कपट सेवा से जानो। जो तत्त्व को जानते हैं, वे ज्ञानी गुरु तुम्हें वह ज्ञान देंगे। जैसे एक प्यासा जब कुएँ के पास झुककर, रस्सी से बाल्टी डालकर, पानी माँगता है — तो पानी मिलता है। अहंकार से माँगने पर नहीं।

प्रणाम, प्रश्न और सेवा — ये तीन शिष्य के गुण हैं। ये तीनों एक साथ हों तभी ज्ञान उतरता है।

यह श्लोक गीता में गुरु की भूमिका पर सबसे स्पष्ट वचन है। ज्ञान स्वयं नहीं आता — गुरु-शरण से आता है।

अगला श्लोक (4.35) उस ज्ञान का फल बताता है — मोह चला जाएगा, सब में स्वयं को और मुझे देखोगे।

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