📿 श्लोक संग्रह

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहम्

गीता 4.35 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥
यत्
जिसे
ज्ञात्वा
जानकर
न पुनः
फिर नहीं
मोहम्
मोह को
एवम्
इस प्रकार
यास्यसि
पाओगे, जाओगे
पाण्डव
हे पाण्डुपुत्र (अर्जुन)
येन
जिससे
भूतानि
सब प्राणियों को
अशेषेण
बिना शेष के, पूरी तरह
द्रक्ष्यसि
देखोगे
आत्मनि
अपने में
अथो
और
मयि
मुझमें

कृष्ण कहते हैं — जो ज्ञान तुम्हें मिलेगा, उसके बाद मोह फिर नहीं आएगा। उस ज्ञान से तुम सब प्राणियों को पहले अपने भीतर और फिर मुझमें देखोगे। यह कोई दर्शनशास्त्र की बात नहीं — यह एक अनुभव की बात है। जैसे जब आँख खुलती है तो अँधेरा अपने आप चला जाता है।

सब प्राणियों में स्वयं को देखना — यह एकता का बोध है। इसी से करुणा जन्मती है और मोह-ममता का भेद मिटता है।

यह श्लोक 4.34 में कहे गुरु-ज्ञान का फल है। ज्ञान का अंतिम परिणाम है — एकत्व का अनुभव।

अगला श्लोक (4.36) बताता है कि यह ज्ञान-नाव सबसे बड़े पापी को भी पार कर देती है।

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