📿 श्लोक संग्रह

योगसंन्यस्तकर्माणम्

गीता 4.41 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥
योगसंन्यस्तकर्माणम्
योग से कर्म त्यागने वाले को
ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्
ज्ञान से संशय काटने वाले को
आत्मवन्तम्
आत्म-संयमी, आत्मा में स्थित
नहीं
कर्माणि
कर्म
निबध्नन्ति
बाँधते हैं
धनञ्जय
हे धनंजय (अर्जुन)

अध्याय के समापन की ओर कृष्ण उस व्यक्ति को याद करते हैं जिसने तीन काम किए — योग से कर्मों को समर्पित किया, ज्ञान से संशय काटा, और आत्मा में स्थिर रहा। ऐसे व्यक्ति को कर्म नहीं बाँधते। जैसे पका हुआ आम पेड़ से बिना खींचे गिर जाता है — कोई जोर नहीं लगाना पड़ता।

योग, ज्ञान और आत्म-स्थिति — ये तीनों एक साथ मुक्ति का आधार बनते हैं। यह अध्याय का निष्कर्ष है।

यह श्लोक 4.40 में वर्णित संशयी के विपरीत है। जो संशय काट दे और योग से कर्म समर्पित करे — वह बँधता नहीं।

अगला और अंतिम श्लोक (4.42) कृष्ण का अर्जुन को सीधा आह्वान है — उठो, योग में लगो, संशय काटो।

अध्याय 4 · 41 / 42
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