📿 श्लोक संग्रह

अपि चेदसि पापेभ्यः

गीता 4.36 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥
अपि चेत्
यदि भी
असि
हो
पापेभ्यः
पापियों में
सर्वेभ्यः
सबसे
पापकृत्तमः
सबसे बड़ा पापी
सर्वम्
सब
ज्ञानप्लवेन
ज्ञान की नाव से
एव
ही
वृजिनम्
पाप, दुर्गमता
सन्तरिष्यसि
पार कर जाओगे

यह श्लोक बड़ी आशा देने वाला है। कृष्ण कहते हैं — यदि तुम सब पापियों में सबसे बड़े पापी भी हो, तो भी ज्ञान की नाव से सारी दुर्गमता पार कर जाओगे। यह वैसे ही है जैसे कितना भी गहरा अँधेरा हो, एक छोटा दीया उसे चीर देता है।

ज्ञान सबसे बड़ा शुद्धिकर्ता है। पिछले कर्म कितने भी हों — ज्ञान होने पर वे बोझ नहीं रहते।

यह श्लोक अगले 4.37 से जुड़ा है जहाँ ज्ञान की अग्नि की बात है। पहले नाव का रूपक, फिर अग्नि का।

परम्परा में यह श्लोक उन लोगों के लिए विशेष आश्वासन माना जाता रहा है जो अपने भूतकाल से पीड़ित हैं।

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