📿 श्लोक संग्रह

यथैधांसि समिद्धोऽग्निः

गीता 4.37 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥
यथा
जैसे
एधांसि
लकड़ियों को
समिद्धः
प्रचंड, प्रज्वलित
अग्निः
अग्नि
भस्मसात्
राख कर देती है
कुरुते
करती है
अर्जुन
हे अर्जुन
ज्ञानाग्निः
ज्ञान की अग्नि
सर्वकर्माणि
सब कर्मों को
तथा
उसी प्रकार

एक बहुत सरल और सुंदर उपमा — जैसे जलती हुई प्रचंड अग्नि लकड़ी को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि सारे कर्मों को जला देती है। राख में कोई अंकुर नहीं उगता — कर्म-बन्धन भी ज्ञान के बाद अंकुरित नहीं होता।

यह रूपक सबको समझ आता है — चूल्हे की आग सबने देखी है। कृष्ण ने सबसे गहरी बात सबसे सरल उदाहरण से कही।

4.36 में 'ज्ञान की नाव' की बात थी। यहाँ 'ज्ञान की अग्नि' आती है। दोनों एक ही सत्य के दो रूपक हैं।

अगला श्लोक (4.38) बताता है कि इस संसार में ज्ञान से बड़ा शुद्धिकर्ता कुछ नहीं है।

अध्याय 4 · 37 / 42
अध्याय 4 · 37 / 42 अगला →