📿 श्लोक संग्रह

एवं बहुविधा यज्ञाः

गीता 4.32 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥
एवम्
इस प्रकार
बहुविधाः
अनेक प्रकार के
यज्ञाः
यज्ञ
विततः
फैले हुए हैं
ब्रह्मणः मुखे
ब्रह्म के मुख में
कर्मजान्
कर्म से जन्मे
विद्धि
जानो
तान् सर्वान्
उन सबको
एवम् ज्ञात्वा
इस प्रकार जानकर
विमोक्ष्यसे
मुक्त होओगे

कृष्ण कहते हैं — ये सभी अनेक प्रकार के यज्ञ ब्रह्म के मुख से — यानी वेदों से — निकले हैं। ये सब कर्म से ही उत्पन्न हैं। यह जानकर कि ज्ञान से ये सब कर्म विमुक्त हो जाते हैं — तुम भी मुक्त होओगे।

ब्रह्मणो मुखे — यह 'वेद' का ही दूसरा नाम है। शास्त्रों में बताए सभी मार्ग कर्म की भूमि पर खड़े हैं, और ज्ञान उन सबको पार करने की चाबी है।

यह श्लोक 4.25–4.31 में बताए यज्ञ-प्रकारों का उपसंहार है। ज्ञान होने पर सभी कर्म-बन्धन टूट जाते हैं।

अगला श्लोक (4.33) ज्ञानयज्ञ की श्रेष्ठता बताता है।

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