📿 श्लोक संग्रह

यज्ञशिष्टामृतभुजः

गीता 4.31 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥
यज्ञशिष्टामृतभुजः
यज्ञ के बचे अमृत को ग्रहण करने वाले
यान्ति
जाते हैं, पाते हैं
ब्रह्म
ब्रह्म को
सनातनम्
सनातन, शाश्वत
न अयम् लोकः
यह लोक भी नहीं
अस्ति
है
अयज्ञस्य
यज्ञ न करने वाले के लिए
कुतः
तो कहाँ से
अन्यः
दूसरा (परलोक)
कुरुसत्तम
हे कुरुश्रेष्ठ (अर्जुन)

जो यज्ञ के प्रसाद — यानी समर्पण के भाव से जीने का फल — ग्रहण करते हैं, वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। और जो बिल्कुल ही यज्ञभाव से नहीं जीता — जिसके जीवन में कोई त्याग, कोई समर्पण नहीं — उसके लिए यह लोक भी नहीं, परलोक की तो बात ही क्या।

यहाँ 'यज्ञ' केवल अग्निकुंड नहीं है। जो भी समर्पण और त्याग के भाव से जीता है — वही यज्ञी है। और जो केवल अपने लिए जीता है — वह अयज्ञी है।

यह श्लोक यज्ञ-खंड (4.25–4.30) का उपसंहार है। यज्ञ का फल और उसके बिना का परिणाम — दोनों स्पष्ट कर दिए गए।

अगला श्लोक (4.32) ब्रह्म के मुख से फैले विभिन्न यज्ञों का सार बताता है।

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