📿 श्लोक संग्रह

स एवायं मया तेऽद्य

गीता 4.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥
सः एव
वही
अयम्
यह
मया
मेरे द्वारा
ते
तुम्हें
अद्य
आज
योगः
योग
प्रोक्तः
कहा गया
पुरातनः
पुराना, प्राचीन
भक्तः
भक्त
सखा
मित्र
रहस्यम्
गुप्त रहस्य
उत्तमम्
सर्वश्रेष्ठ

कृष्ण अर्जुन से कहते हैं — वही पुराना, शाश्वत योग जो लुप्त हो गया था, आज मैं तुम्हें दे रहा हूँ। और यह इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि तुम मेरे भक्त हो और मेरे मित्र हो। यह प्रेम का उपहार है — जैसे दादा अपना सबसे कीमती रहस्य अपने प्रिय पोते को ही बताते हैं।

यह श्लोक बताता है कि परमज्ञान केवल पात्र को ही दिया जाता है। भक्ति और मित्रता — यही वह पात्रता है जो अर्जुन में थी। ज्ञान का यह रहस्य उत्तम है — इसलिए इसे ग्रहण करने योग्य हृदय चाहिए।

यह श्लोक 4.1 और 4.2 की कड़ी में आता है। पहले दो श्लोकों में कृष्ण ने योग की परम्परा और उसके लुप्त होने की बात कही; यहाँ वे उस ज्ञान को अर्जुन तक पहुँचाने का कारण बताते हैं।

अगला श्लोक (4.4) में अर्जुन एक स्वाभाविक प्रश्न पूछते हैं — आपका जन्म बाद में हुआ, विवस्वान् का पहले; तो यह कैसे सम्भव है?

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