कृष्ण अर्जुन से कहते हैं — वही पुराना, शाश्वत योग जो लुप्त हो गया था, आज मैं तुम्हें दे रहा हूँ। और यह इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि तुम मेरे भक्त हो और मेरे मित्र हो। यह प्रेम का उपहार है — जैसे दादा अपना सबसे कीमती रहस्य अपने प्रिय पोते को ही बताते हैं।
यह श्लोक बताता है कि परमज्ञान केवल पात्र को ही दिया जाता है। भक्ति और मित्रता — यही वह पात्रता है जो अर्जुन में थी। ज्ञान का यह रहस्य उत्तम है — इसलिए इसे ग्रहण करने योग्य हृदय चाहिए।