कृष्ण बताते हैं कि अलग-अलग साधक अलग-अलग तरह से यज्ञ करते हैं। कुछ देवताओं की पूजा-अर्चना को ही अपना यज्ञ मानते हैं। कुछ और ऊँचे साधक यज्ञ की क्रिया को ही ब्रह्म की अग्नि में आहुति के रूप में देखते हैं — अर्थात वे यज्ञ से परे, ब्रह्म में लीन हैं।
यह दोनों मार्गों का वर्णन है — भक्ति और ज्ञान। दोनों मान्य हैं, दोनों एक ही दिशा में हैं।