यह श्लोक गीता का एक अत्यंत गहरा वचन है। कृष्ण कहते हैं — यज्ञ में अर्पण करने वाला पात्र भी ब्रह्म है, आहुति भी ब्रह्म है, जिस अग्नि में डाला जाता है वह भी ब्रह्म है, और जो डालता है वह भी ब्रह्म है। जब सब कुछ ब्रह्म ही है तो 'मैं कर रहा हूँ' का अहंकार कहाँ रहा? जैसे समुद्र की सभी लहरें पानी ही हैं।
परम्परा में इस श्लोक को भोजन करने से पहले भी स्मरण किया जाता रहा है — यह मानते हुए कि खाना और खाने वाला, दोनों ब्रह्म हैं।