यहाँ दो और प्रकार के यज्ञ बताए गए हैं। एक — जो कान, आँख जैसी इन्द्रियों को संयम की अग्नि में डालते हैं यानी इन्द्रियों को रोककर साधना करते हैं। दूसरे — जो शब्द, रूप, स्पर्श जैसे विषयों को इन्द्रियों की अग्नि में अर्पित करते हैं यानी इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव को ही साधना बना लेते हैं।
दोनों रास्ते अलग-अलग हैं लेकिन दोनों में साधक यज्ञ की भावना से जीता है — संयम भी यज्ञ है, अनुभव भी यज्ञ है।