📿 श्लोक संग्रह

एवं परम्पराप्राप्तम्

गीता 4.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥
एवम्
इस प्रकार
परम्पराप्राप्तम्
परम्परा से प्राप्त
इमम्
इस (योग को)
राजर्षयः
राजऋषियों ने
विदुः
जाना
सः
वह
कालेन
समय के साथ
महता
बहुत लम्बे
योगः
यह योग
नष्टः
लुप्त हो गया
परन्तप
हे शत्रुओं को तपाने वाले (अर्जुन)

कृष्ण बताते हैं कि यह योग राजऋषियों की परम्परा से आगे बढ़ता रहा — पीढ़ी दर पीढ़ी। लेकिन जैसे कोई पुरानी कहानी बार-बार सुनाने से थोड़ी-थोड़ी बदल जाती है, वैसे ही बहुत समय बीतने पर यह ज्ञान धुंधला पड़ गया और इस धरती पर लुप्त-सा हो गया।

यह श्लोक एक महत्त्वपूर्ण बात कहता है — अच्छा ज्ञान भी यदि संजोया न जाए तो खो जाता है। इसीलिए कृष्ण इसे अर्जुन को फिर से दे रहे हैं — ताकि यह अनमोल ज्ञान आगे चलता रहे।

पिछले श्लोक (4.1) में कृष्ण ने इस योग की परम्परा बताई थी। यहाँ वे कहते हैं कि वह परम्परा दीर्घकाल में टूट गई।

अगला श्लोक (4.3) में कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि वे उसे ही यह पुराना योग आज फिर से दे रहे हैं।

अध्याय 4 · 2 / 42
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