भगवान कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह अविनाशी योग उन्होंने सबसे पहले सूर्यदेव विवस्वान् को दिया था। विवस्वान् ने यही ज्ञान मनु को दिया, और मनु ने राजा इक्ष्वाकु को। इस तरह यह ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहा — जैसे घर का दीपक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जलता हुआ मिलता है।
इस श्लोक से पता चलता है कि गीता का यह उपदेश कोई नई बात नहीं है। यह बहुत पुराना ज्ञान है जो राजऋषियों की परंपरा में रहा। कृष्ण इसे अर्जुन तक फिर से पहुँचा रहे हैं।