📿 श्लोक संग्रह

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः

गीता 3.40 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥
इन्द्रियाणि
इंद्रियाँ
मनः
मन
बुद्धिः
बुद्धि
अस्य अधिष्ठानम्
इसका निवास-स्थान
उच्यते
कहा जाता है
एतैः
इनके द्वारा
विमोहयति
भ्रमित करता है
एषः
यह काम
ज्ञानम् आवृत्य
ज्ञान को ढककर
देहिनम्
देहधारी को — आत्मा को

काम कहाँ रहता है? यहाँ बताया — इंद्रियों में, मन में और बुद्धि में। यही तीन उसके घर हैं। इंद्रियाँ विषयों की ओर खिंचती हैं, मन उनमें रमता है, बुद्धि तर्क देकर गलत को सही ठहराती है।

इन तीनों के माध्यम से काम ज्ञान को ढकता है और देही को भ्रमित करता है। यह समझना जरूरी है — शत्रु बाहर नहीं, भीतर है। और वह तीन स्तरों पर कार्य करता है।

यह 3.39 का स्पष्टीकरण है। काम कहाँ बैठा है — इंद्रियाँ, मन, बुद्धि। इसीलिए इन तीनों की साधना जरूरी है।

3.41 में इसका उत्तर मिलेगा — पहले इंद्रियों को नियंत्रित करो, फिर काम को जीतो।

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