काम को यहाँ 'ज्ञानिनो नित्यवैरिणा' कहा — ज्ञानी का नित्य शत्रु। साधारण व्यक्ति की बात नहीं, ज्ञानी का भी यह शत्रु है। इसलिए इससे सावधान रहना और भी जरूरी है।
'दुष्पूरेण अनलेन' — जो कभी भरता नहीं, अग्नि की तरह। जितना खिलाओ, उतना और माँगता है। यह काम की सबसे बड़ी विशेषता है — तृप्ति नहीं।