📿 श्लोक संग्रह

आवृतं ज्ञानमेतेन

गीता 3.39 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥
आवृतम्
ढका हुआ
ज्ञानम् एतेन
ज्ञान इससे
ज्ञानिनः
ज्ञानी का — ज्ञानी के
नित्यवैरिणा
नित्य शत्रु से
कामरूपेण
काम के रूप वाले
कौन्तेय
हे कुंतीपुत्र (अर्जुन)
दुष्पूरेण
कभी न भरने वाले
अनलेन
अग्नि से — आग जैसे

काम को यहाँ 'ज्ञानिनो नित्यवैरिणा' कहा — ज्ञानी का नित्य शत्रु। साधारण व्यक्ति की बात नहीं, ज्ञानी का भी यह शत्रु है। इसलिए इससे सावधान रहना और भी जरूरी है।

'दुष्पूरेण अनलेन' — जो कभी भरता नहीं, अग्नि की तरह। जितना खिलाओ, उतना और माँगता है। यह काम की सबसे बड़ी विशेषता है — तृप्ति नहीं।

यह 3.37–3.38 की कड़ी में तीसरा श्लोक है। काम का वर्णन यहाँ पूर्ण होता है — शत्रु, ज्ञान-ढाकने वाला, कभी न तृप्त होने वाला।

3.40 में काम का निवास-स्थान बताया जाएगा — इंद्रियाँ, मन और बुद्धि।

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