📿 श्लोक संग्रह

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ

गीता 3.41 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 3 — कर्मयोग
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥
तस्मात्
इसलिए
त्वम्
तुम
इन्द्रियाणि
इंद्रियों को
आदौ
पहले
नियम्य
नियंत्रित करके
भरतर्षभ
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ (अर्जुन)
पाप्मानम्
इस पापी को — पाप को
प्रजहि
मारो — नष्ट करो
हि एनम्
इसे ही
ज्ञानविज्ञाननाशनम्
ज्ञान और विज्ञान का नाशक

अब कृष्ण उपाय बताते हैं। काम का पहला घर इंद्रियाँ हैं — इसलिए पहले इंद्रियों को नियंत्रित करो। यह साधना का पहला कदम है।

'ज्ञानविज्ञाननाशनम्' — ज्ञान और विज्ञान दोनों का नाश करने वाले काम को मारो। यहाँ 'विज्ञान' का अर्थ है — अनुभव-जन्य ज्ञान, साक्षात्कार। काम इन दोनों को नष्ट करता है।

यह 3.40 का समाधान है — काम इंद्रियों में रहता है, तो इंद्रियों से ही शुरू करो। गीता 3.7 में भी 'इंद्रियाणि मनसा नियम्य' कहा था।

3.42–3.43 में इस साधना की क्रमिक प्रक्रिया बताई जाएगी — इंद्रिय से मन, मन से बुद्धि, बुद्धि से परे।

अध्याय 3 · 41 / 43
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